धार्मिक ज्ञान एवं पर्व

धार्मिक ज्ञान एवं पर्व, पूजा विधि एवं अनुष्ठान

पापांकुशा एकादशी 2026: समस्त पापों का नाश करने वाला महाव्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पारण का समय

सनातन धर्म में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘पापांकुशा एकादशी’ कहा जाता है। यह एकादशी विजयादशमी (दशहरे) के ठीक अगले दिन आती है। पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, जिस प्रकार हाथी को वश में करने के लिए अंकुश का प्रयोग किया जाता है, ठीक उसी प्रकार यह एकादशी मनुष्य के कायिक, वाचिक और मानसिक पापों पर अंकुश लगाकर उनका नाश कर देती है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के चतुर्भुज ‘पद्मनाभ’ स्वरूप की विधिवत आराधना की जाती है। मान्यता है कि जो जातक निष्काम भाव से इस व्रत का पालन करता है, उसे यमलोक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है और वह अंत काल में वैकुंठ लोक को प्राप्त करता है।

पापांकुशा एकादशी का पौराणिक महत्व

पद्म पुराण में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इस एकादशी की महिमा बताते हुए कहा है:

  • त्रिकुल उद्धारिणी तिथि: जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक पापांकुशा एकादशी का व्रत रखता है, वह अपने मातृपक्ष की दस पीढ़ियों, पितृपक्ष की दस पीढ़ियों और पत्नी/पति के पक्ष की दस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है।
  • अश्वमेध और सूर्यग्रहण स्नान के समान पुण्य: शास्त्रों में वर्णित है कि हजारों अश्वमेध यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञ करने से जो फल प्राप्त होता है, वह पापांकुशा एकादशी के व्रत के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं है।
  • आरोग्य और मोक्ष की प्राप्ति: यह व्रत न केवल परलोक सुधारता है, बल्कि इस लोक में उत्तम स्वास्थ्य, सुयोग्य संतान, धन-ऐश्वर्य और मानसिक शांति भी प्रदान करता है।

पापांकुशा एकादशी पूजन विधि

  1. प्रातः संकल्प एवं शुद्धि: एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त हों। स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद हाथ में जल, पीले पुष्प, अक्षत और सिक्का लेकर भगवान पद्मनाभ के सम्मुख व्रत का संकल्प लें।
  2. कलश व श्रीहरि स्थापना: पूजा की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं और भगवान विष्णु अथवा लड्डू गोपाल जी की प्रतिमा स्थापित करें। यदि संभव हो तो पास में एक छोटा मंगल कलश भी स्थापित करें।
  3. षोडशोपचार पूजन: भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं। तत्पश्चात चंदन, रोली, पीले पुष्प, पीले फल, जनेऊ और तुलसी दल अर्पित करें। ध्यान रखें कि बिना तुलसी दल के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते (एकादशी के दिन तुलसी दल न तोड़ें, एक दिन पहले तोड़ा हुआ पत्ता प्रयोग करें)।
  4. दीपक एवं मंत्र जप: गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूप-दीप दिखाकर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र की कम से कम 5 माला जपें। इस दिन ‘विष्णु सहस्रनाम’ का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
  5. रात्रि जागरण एवं भजन: एकादशी की रात्रि में सोना वर्जित माना गया है। रात्रि में भगवान के भजनों का संकीर्तन करें और एकादशी व्रत कथा का श्रवण करें।

संक्षिप्त पौराणिक व्रत कथा

प्राचीन काल में विंध्य पर्वत पर ‘क्रोधन’ नाम का एक अत्यंत क्रूर और अधर्मी बहेलिया रहता था। उसने अपने संपूर्ण जीवन में हिंसा, मद्यपान और पाप कर्म ही किए थे। जब उसका अंतिम समय निकट आया, तो यमराज के दूतों को देखकर वह भयभीत हो गया। मृत्यु के भय से कांपता हुआ वह महर्षि अंगिरा के आश्रम में जा पहुंचा और उनके चरणों में गिरकर रोने लगा—“हे मुनिवर! मैंने जीवन भर केवल पाप किए हैं। कृपा कर मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मैं नरक की घोर यातनाओं से बच सकूं।”

महर्षि अंगिरा ने उसकी दयनीय दशा देखकर उस पर दया की और कहा—“तुम आश्विन शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो और भगवान पद्मनाभ की शरण में जाओ।” बहेलिए ने मुनि के वचनों का पालन करते हुए पूर्ण भक्तिभाव से पापांकुशा एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से उसके जीवन भर के समस्त पाप भस्म हो गए और मृत्यु के उपरांत यमदूतों के स्थान पर भगवान विष्णु के पार्षद उसे दिव्य विमान में बैठाकर वैकुंठ धाम ले गए।

पापांकुशा एकादशी के दिन किए जाने वाले 4 अचूक उपाय

  • 1. स्वर्ण, तिल अथवा छाता दान: इस दिन सुपात्र ब्राह्मण को तिल, अन्न, पादुका (जूते-चप्पल) या छाते का दान करने से कभी यमराज के दंड का सामना नहीं करना पड़ता।
  • 2. पीपल वृक्ष की पूजा: पीपल की जड़ में कच्चा दूध और जल अर्पित करें तथा शाम को सरसों के तेल या घी का दीपक जलाएं।
  • 3. तुलसी नामाष्टक का पाठ: तुलसी माता के सम्मुख शाम को शुद्ध घी का दीपक जलाकर 11 बार परिक्रमा करें और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।
  • 4. द्वादशी पारण नियम: एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी मिलता है जब द्वादशी तिथि के सूर्योदय के बाद और हरिवासर समाप्त होने पर विधिपूर्वक पारण किया जाए। पारण से पूर्व किसी सात्विक ब्राह्मण को भोजन या सीधा दान अवश्य दें।

पापांकुशा एकादशी पर श्रीहरि महापूजा एवं संकल्प सेवा

क्या आप अपने जीवन के जाने-अनजाने हुए पापों के प्रायश्चित, पितृ तृप्ति और कुंडली में स्थित अशुभ ग्रह दोषों की शांति के लिए पापांकुशा एकादशी पर विशेष अनुष्ठान करवाना चाहते हैं? विद्वान आचार्यों द्वारा अपने नाम और गोत्र से विधिपूर्वक विष्णु सहस्रनाम पाठ, तुलसी अर्चन एवं ब्राह्मण भोजन संकल्प संपन्न करवाने हेतु संपर्क करें।

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शारदीय नवरात्रि 2026: घटस्थापना शुभ मुहूर्त, माँ शैलपुत्री पूजा विधि, अखंड ज्योति नियम और प्रिय भोग

11 अक्टूबर 2026 से शक्ति उपासना का महापर्व शारदीय नवरात्रि आरंभ हो चुका है। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक चलने वाले इन पावन नौ दिनों में आदिशक्ति माँ भगवती के नौ दिव्य स्वरूपों (नवदुर्गा) की आराधना की जाती है। नवरात्रि का प्रथम दिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी दिन शुभ मुहूर्त में घटस्थापना (कलश स्थापना) कर माँ दुर्गा का आह्वान किया जाता है और प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री की पूजा-अर्चना संपन्न होती है।

सनातन धर्म में कलश को साक्षात गणेश जी, त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और समस्त तीर्थों का साक्षात स्वरूप माना गया है:

  • सृष्टि और समृद्धि का प्रतीक: घटस्थापना के समय मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं। मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में सबसे पहले अन्न के रूप में जौ ही उत्पन्न हुआ था। जौ के उगने की गति और रंग से आगामी वर्ष की संपन्नता का अनुमान लगाया जाता है।
  • वरुण देव और त्रिदेवी का वास: कलश के मुख में भगवान विष्णु, कंठ में भगवान शिव और मूल में ब्रह्मा जी का वास होता है, जबकि कलश के मध्य भाग में समस्त मातृकाओं व देवियों का वास माना जाता है।

घटस्थापना की प्रामाणिक एवं सरल विधि

  1. स्थान का चयन एवं वेदी निर्माण: घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या पूजा घर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। वहां एक पाटे (चौकी) पर लाल वस्त्र बिछाएं।
  2. जौ बोना: मिट्टी के एक चौड़े पात्र में शुद्ध मिट्टी डालें और उसमें सप्तधान्य अथवा जौ बोएं। हल्का सा जल छिड़कें।
  3. कलश स्थापना: तांबे या मिट्टी के कलश पर स्वास्तिक का चिह्न बनाएं और मौली (कलावा) बांधें। कलश में शुद्ध जल व गंगाजल भरें। इसमें एक सुपारी, हल्दी की गांठ, सिक्का, अक्षत और दूर्वा डालें।
  4. पल्लव एवं नारियल: कलश के मुख पर 5 या 7 आम अथवा अशोक के पत्ते लगाएं। इसके बाद एक जटा वाले सूखे नारियल पर लाल चुनरी या कलावा लपेटकर उसे कलश के ऊपर पूर्ण श्रद्धा से स्थापित करें।
  5. आह्वान: हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर सभी देवी-देवताओं और वरुण देव का ध्यान करें तथा प्रार्थना करें—“हे समस्त देवी-देवताओं! आप इस कलश में नौ दिनों तक वास करें और हमारे परिवार पर कृपा दृष्टि बनाए रखें।”

प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की उपासना

पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण माता का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री कहलाता है। माँ शैलपुत्री वृषभ (बैल) पर सवार हैं, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है। माँ शैलपुत्री का पूजन करने से साधक को मूलाधार चक्र जाग्रत करने की शक्ति मिलती है और जीवन में स्थिरता, आरोग्य व दृढ़ संकल्प की प्राप्ति होती है।

  • माँ शैलपुत्री का ध्यान मंत्र:वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
  • सरल बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नमः॥
  • माँ का प्रिय भोग: माँ शैलपुत्री को गाय का शुद्ध देसी घी अथवा घी से निर्मित सफेद मिष्ठान्न (मिश्री, खीर, मावे का पेड़ा) अत्यंत प्रिय है। इससे जातक को गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है।
  • शुभ रंग: प्रथम दिन पीला (Yellow) अथवा श्वेत वस्त्र पहनकर पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है।

अखंड ज्योति प्रज्वलित करने के 3 अनिवार्य नियम

यदि आप नवरात्रि में अखंड ज्योति स्थापित कर रहे हैं, तो इन नियमों का पालन अवश्य करें:

  1. दिशा का ध्यान: अखंड ज्योति को कलश के पास पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा में रखें। यदि ज्योति घी की है तो देवी के दाईं ओर और यदि तिल के तेल की है तो बाईं ओर रखें।
  2. सदा प्रज्वलित रखें: ज्योति को कभी अकेला न छोड़ें। हवा से बचाने के लिए कांच की चिमनी या रक्षा आवरण लगाएं। बत्ती को बदलते या ठीक करते समय एक छोटा दीपक अलग से जलाकर रखें ताकि मूल ज्योति बुझने न पाए।
  3. सात्विकता और शुद्धि: जिस घर में अखंड ज्योति जलती है, वहां नौ दिनों तक घर को ताला लगाकर खाली नहीं छोड़ना चाहिए और पूर्ण ब्रह्मचर्य व सात्विकता का पालन करना अनिवार्य है।

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सर्वपितृ अमावस्या 2026: तिथि भूल गए हों तो इस दिन करें सभी पितरों का श्राद्ध, जानें तर्पण विधि और 16 दीपकों का रहस्य

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ‘सर्वपितृ अमावस्या’, ‘पितृ विसर्जनी अमावस्या’ अथवा ‘महालय अमावस्या’ कहा जाता है। यह पितृ पक्ष का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, 16 दिनों तक भूलोक पर परिजनों के बीच रहने के बाद इस दिन समस्त पितर अपने लोक (पितृ लोक) के लिए प्रस्थान करते हैं। यदि पूरे पितृ पक्ष में किसी कारणवश आप अपने पितरों का श्राद्ध या तर्पण न कर पाए हों, या पूर्वजों की निश्चित मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो केवल सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धापूर्वक किया गया श्राद्ध कुल के सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों को पूर्ण तृप्ति प्रदान करता है।

सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध का महत्व: जब कोई तिथि ज्ञात न हो

शास्त्रों में इस दिन को ‘सर्व मोक्षदायिनी अमावस्या’ माना गया है:

  • सभी पितरों का संयुक्त श्राद्ध: माता, पिता, दादा-दादी, नाना-नानी अथवा कुल के ऐसे पूर्वज जिनकी मृत्यु तिथि याद नहीं है, उन सभी का श्राद्ध इसी दिन किया जाता है।
  • भूल-चूक की क्षमा: यदि पितृ पक्ष की किसी निश्चित तिथि पर श्राद्ध करने में कोई त्रुटि रह गई हो, तो अमावस्या के दिन तर्पण व दान करने से पितर प्रसन्न होकर सभी दोष क्षमा कर देते हैं।
  • पितृ विसर्जन का दिन: इस दिन पितर विदा होते हैं, इसलिए इस दिन किया गया तर्पण उन्हें विदाई का पाथेय (मार्ग का संबल) प्रदान करता है।

श्राद्ध एवं तर्पण का शास्त्रोक्त समय

सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध कर्म दोपहर के समय ही संपन्न करना चाहिए:

  • कुतुप मुहूर्त: पूर्वाह्न 11:45 AM से दोपहर 12:31 PM तक (श्राद्ध संकल्प व तर्पण का श्रेष्ठ समय)
  • रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:31 PM से 01:17 PM तक (ब्राह्मण भोजन व पिंडदान का समय)
  • अपराह्न काल: दोपहर 01:17 PM से 03:20 PM तक (दान व विसर्जन संपन्न करने का समय)

सर्वपितृ अमावस्या की सरल एवं अचूक पूजन विधि

  1. प्रातः स्नान एवं संकल्प: सुबह पवित्र नदी में स्नान करें अथवा घर में ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। श्वेत वस्त्र धारण कर पूर्वजों का स्मरण करें।
  2. जलांजलि एवं तर्पण: दोपहर के समय तांबे के लोटे में शुद्ध जल, गंगाजल, कच्चा दूध, काले तिल, जौ और अक्षत मिलाएं। हाथ में कुशा धारण कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के निमित्त कम से कम तीन बार अंजलि से जल अर्पित करें।
  3. पंचबली भोग: ब्राह्मण भोजन से पूर्व भोजन में से 5 भाग (पूरी-खीर) पत्तल पर निकालें—पहला गाय (गोबली), दूसरा कुत्ते (श्वानबली), तीसरा कौवे (काकबली), चौथा देवताओं और पांचवां भाग चींटियों (पिपीलिकादि) के लिए निकालें।
  4. ब्राह्मण भोजन एवं दक्षिणा: किसी योग्य सात्विक ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराएं और उन्हें वस्त्र, अनाज व सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा भेंट कर चरण स्पर्श करें।

संध्याकाल में पितृ विसर्जन: 16 दीपकों का विधान

सर्वपितृ अमावस्या की शाम को पितरों की सुखद विदाई के लिए दीपदान का विशेष महत्व है:

  • सूर्यास्त के समय घर के मुख्य द्वार पर, पीपल के वृक्ष के नीचे और तुलसी के पास दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दीपक जलाएं।
  • कई परंपराओं में 16 दिनों के प्रतीक स्वरूप 16 दीपक जलाने का विधान है।
  • मान्यता है कि अमावस्या की घनी रात्रि में पितर अपने लोक लौटते हैं; दक्षिण दिशा में जलाया गया दीपक उनके मार्ग को आलोकित करता है और वे संतुष्ट होकर वंश को दीर्घायु, यश और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

सर्वपितृ अमावस्या पर महातर्पण एवं पितृ दोष निवारण संकल्प करवाएँ

सर्वपितृ अमावस्या वर्ष का वह अंतिम अवसर है जब आप अपने समस्त ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों के निमित्त विशेष तर्पण, गीता पाठ और ब्राह्मण भोजन का संकल्प ले सकते हैं। यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष के कारण उन्नति बाधित हो रही है, तो योग्य वैदिक आचार्यों द्वारा अपने नाम और गोत्र से संपूर्ण महापूजा संपन्न कराने हेतु संपर्क करें।

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इन्दिरा एकादशी 2026: पितरों को मोक्ष दिलाने वाला महाव्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और व्रत कथा

सनातन धर्म में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को ‘इन्दिरा एकादशी’ कहा जाता है। यह एकादशी पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) के मध्य में आती है, जिस कारण इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अन्य सभी एकादशियों से कहीं अधिक बढ़ जाता है। भविष्य पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, यदि किसी कारणवश परिवार का कोई पूर्वज अपने कर्मों के फल स्वरूप यमलोक अथवा अधोगति (कष्टकारी योनि) में भटक रहा हो, तो उसके वंशज द्वारा विधिपूर्वक इन्दिरा एकादशी का व्रत रखने और उसका पुण्य फल पितरों को समर्पित करने से उन्हें तत्काल मुक्ति प्राप्त होकर वैकुंठ की प्राप्ति होती है।

इन्दिरा एकादशी की सरल पूजन एवं तर्पण विधि

  • दशमी तिथि की सात्विकता: एकादशी व्रत के नियम दशमी तिथि की संध्या से ही आरंभ हो जाते हैं। दशमी के दिन सूर्यास्त के बाद भोजन न करें और मन में सात्विक विचार रखें।
  • प्रातः संकल्प एवं शालिग्राम पूजन: एकादशी की सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर गंगाजल मिले जल से स्नान करें। स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर भगवान श्रीहरि विष्णु अथवा शालिग्राम जी के सम्मुख घी का दीपक प्रज्वलित करें। हाथ में जल, अक्षत और तुलसी दल लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु को भोग एवं तुलसी दल: भगवान विष्णु को पंचामृत, पीले पुष्प, मौसमी फल और पंजीरी अर्पित करें। ध्यान रखें कि भगवान विष्णु के भोग में तुलसी पत्र अवश्य शामिल हो, किंतु एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें (उन्हें एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें)।
  • पितरों के निमित्त तर्पण एवं पिंडदान: दोपहर के समय (कुतुप व रौहिण मुहूर्त में) दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले तिल, कुश और जल से पितरों का तर्पण करें। इसके बाद कहें—‘मेरे इस व्रत का समस्त पुण्य फल मेरे पूर्वजों को प्राप्त हो और उन्हें श्रीहरि के श्रीचरणों में स्थान मिले।’
  • द्वादशी के दिन पारण व ब्राह्मण भोजन: द्वादशी के दिन प्रातः पुनः स्नान-पूजन कर किसी सात्विक ब्राह्मण को भोजन कराएं, दक्षिणा दें और उसके पश्चात ही स्वयं व्रत का पारण करें।

इन्दिरा एकादशी की संक्षिप्त पौराणिक व्रत कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में माहिष्मती नगरी के धर्मपरायण राजा इंद्रसेन के सामने एक दिन देवर्षि नारद प्रकट हुए। नारद जी ने बताया कि यमलोक यात्रा के दौरान वे राजा के दिवंगत पिता से मिले, जो अपने पूर्व जन्म के किसी दोष के कारण यमलोक में कष्ट भोग रहे हैं।

पिता ने नारद जी के माध्यम से अपने पुत्र इंद्रसेन को संदेश भेजा था कि यदि उनका पुत्र आश्विन कृष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत रखे और उसका पुण्य फल उन्हें दान कर दे, तो उन्हें यमलोक के कष्टों से मुक्ति मिलकर स्वर्ग की प्राप्ति होगी। राजा इंद्रसेन ने महर्षि नारद द्वारा बताई गई संपूर्ण विधि से इन्दिरा एकादशी का व्रत रखा और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर पुण्य अपने पिता को समर्पित किया। इसके प्रभाव से राजा के पिता दिव्य विमान में बैठकर सीधे वैकुंठ धाम को प्रस्थान कर गए।

इस दिन किए जाने वाले 4 विशेष पुण्य उपाय

  • 1. श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय का पाठ: इन्दिरा एकादशी के दिन गीता के ग्यारहवें अध्याय (विश्वरूप दर्शन योग) का पाठ कर उसका पुण्य अपने पितरों को अर्पित करने से बड़े से बड़ा पितृ दोष शांत होता है।
  • 2. पीपल वृक्ष की परिक्रमा: दोपहर से पूर्व पीपल के वृक्ष में कच्चा दूध और जल अर्पित कर 7 बार परिक्रमा करें। सायंकाल पीपल की जड़ के पास गाय के घी का दीपक जलाएं।
  • 3. गो-सेवा और हरा चारा दान: इस दिन किसी गोशाला में जाकर गायों को हरा चारा, गुड़ और भीगी हुई चना दाल खिलाएं।
  • 4. विष्णु सहस्रनाम का जप: परिवार में सुख, शांति और समृद्धि के लिए ‘विष्णु सहस्रनाम’ का पाठ करें अथवा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र की 5 माला जपें।

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पितृ पक्ष में भूलकर भी न करें ये 7 गलतियां: शास्त्रों के अनुसार वर्जित हैं ये कार्य, जानें पितृ दोष से बचने के कड़े नियम

पितृ पक्ष में क्या न करें? 7 प्रमुख वर्जित कार्य

  • 1. मांगलिक और नए शुभ कार्यों का आरंभ न करें:पितृ पक्ष के दौरान विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार अथवा नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्य पूर्णतः वर्जित हैं। यह समय केवल पितरों के स्मरण और आत्मशांति के लिए आरक्षित है।
  • 2. तामसिक भोजन, लहसुन-प्याज और मदिरा का त्याग:श्राद्ध पक्ष में घर में पूर्ण सात्विकता रहनी चाहिए। मांस, मछली, मदिरा के साथ-साथ लहसुन, प्याज, मसूर की दाल, हींग, चना और बासी भोजन का प्रयोग भोजन में बिल्कुल न करें।
  • 3. बाल, दाढ़ी कटवाने और नाखून काटने से बचें:जो व्यक्ति अपने पितरों का मुख्य श्राद्ध या तर्पण कर रहा हो, उसे इस अवधि में दाढ़ी-मूंछ, बाल कटवाने या नाखून काटने से बचना चाहिए। इसे शोक और संयम का प्रतीक माना गया है।
  • 4. द्वार पर आए भिक्षुक, पशु या पक्षी का अनादर न करें:मान्यता है कि पितृ पक्ष में हमारे पूर्वज किसी भी रूप (कुत्ता, गाय, कौवा अथवा निर्धन याचक) में आपके द्वार पर आ सकते हैं। किसी भी जीव को दुत्कारें नहीं; उन्हें अन्न, जल या भोजन अवश्य दें।
  • 5. लोहे या स्टील के बर्तनों का प्रयोग न करें:पितरों के तर्पण, पिंडदान या श्राद्ध के भोजन में लोहे और स्टील के बर्तनों का उपयोग वर्जित माना गया है। शास्त्रों में इसके लिए तांबा, पीतल, चांदी अथवा पत्तल (पलाश/केले के पत्ते) को ही शुद्ध माना गया है।
  • 6. संध्याकाल या रात्रि में श्राद्ध न करें:श्राद्ध कर्म कभी भी सुबह जल्दी या सूर्यास्त के बाद नहीं किया जाता। पितरों के लिए भोजन और तर्पण का सर्वश्रेष्ठ समय हमेशा दोपहर का कुतुप एवं रौहिण मुहूर्त (लगभग 11:45 AM से 01:30 PM के मध्य) ही होता है।
  • 7. घर में कलह, असत्य और कटु वचनों से बचें:जिस घर में पितृ पक्ष के दौरान माता-पिता, बुजुर्गों अथवा स्त्रियों का अपमान होता है, वहां पितर जल और तर्पण स्वीकार किए बिना ही अतृप्त लौट जाते हैं। परिवार में शांति, संयम और मधुर वाणी बनाए रखें।

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मातृ नवमी 2026: माता, दादी और कुल की स्त्रियों के श्राद्ध का महत्व, पूजन विधि और अखंड सौभाग्य के उपाय

सनातन परंपरा में आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को ‘मातृ नवमी’ के नाम से जाना जाता है। इसे अविधवा नवमी भी कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार, यह तिथि परिवार की दिवंगत माताओं, दादियों, सास और कुल की समस्त पूजनीय स्त्रियों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान के लिए समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन किया गया श्राद्ध कुल की नारियों की आत्मा को परम तृप्ति प्रदान करता है और उनके आशीर्वाद से घर में अखंड सौभाग्य, वंश वृद्धि और संतान का कल्याण होता है।

मातृ नवमी पर किसका श्राद्ध किया जाता है?

  • दिवंगत माताओं और पूर्वज स्त्रियों का: जिन माताओं या कुल की स्त्रियों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, या जिनकी मृत्यु किसी भी महीने की नवमी तिथि को हुई हो, उन सभी का श्राद्ध मातृ नवमी को ही करने का विधान है।
  • सौभाग्यवती स्त्रियों के निमित्त: यदि किसी स्त्री का देहावसान उनके पति के रहते (सुहागिन रूप में) हुआ हो, तो उनके निमित्त इस दिन किया गया श्राद्ध अक्षय फलदायी होता है।

मातृ नवमी श्राद्ध की सरल वैदिक विधि

  • प्रातः संकल्प एवं सात्विक भोजन: सुबह स्नान कर स्वच्छ श्वेत या हल्के पीले वस्त्र धारण करें। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूर्वज माताओं का स्मरण कर हाथ में जल, अक्षत और तिल लेकर संकल्प लें।
  • खीर और पूड़ी का विशेष भोग: मातृ नवमी के दिन घर में खीर, पूड़ी और सात्विक मिष्ठान्न अवश्य तैयार करना चाहिए।
  • पंचबली भोग: भोजन तैयार होने के बाद सबसे पहले 5 पत्तों पर गाय, कुत्ते, कौवे, देवगण और चींटियों के लिए ग्रास निकालें।
  • ब्राह्मणी या सुहागिन स्त्री को भोजन एवं सुहाग सामग्री दान: इस दिन किसी योग्य ब्राह्मण परिवार की सात्विक ब्राह्मणी अथवा किसी सौभाग्यवती स्त्री को आदरपूर्वक भोजन कराएं। भोजनोपरांत उन्हें दक्षिणा के साथ लाल वस्त्र, रोली, चूड़ियां, बिंदी और फल-मिष्ठान्न भेंट कर चरण स्पर्श करें।

मातृ नवमी के दिन क्या लाभ मिलते हैं?

  • मातृ ऋण से मुक्ति: शास्त्रों में माता का ऋण सबसे बड़ा माना गया है। इस दिन श्रद्धापूर्वक स्मरण करने से मातृ दोष का निवारण होता है।
  • पारिवारिक क्लेश की समाप्ति: यदि परिवार में महिलाओं के बीच तनाव या अशांति रहती हो, तो पूर्वज माताओं के आशीर्वाद से घर में स्नेह और सौहार्द का वातावरण बनता है।
  • संतान सुख एवं विद्या वृद्धि: माताओं की आत्मा तृप्त होने पर संतान के स्वास्थ्य, विद्या और करियर की बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

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धार्मिक ज्ञान एवं पर्व

भाद्रपद पूर्णिमा 2026: सत्यनारायण पूजन विधि, चंद्र अर्घ्य का समय और माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के 4 उपाय

सनातन परंपरा में भाद्रपद पूर्णिमा का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह तिथि चातुर्मास के पावन नियमों के अंतर्गत आती है और इसी दिन से पितृ पक्ष के श्राद्ध कर्मों की शुरुआत भी मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार, पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा अपनी समस्त 16 कलाओं से युक्त होकर अमृत वर्षा करता है। इस पावन दिन भगवान श्री सत्यनारायण और माता महालक्ष्मी का विधि-विधान से पूजन करने से घर में संचित धन की वृद्धि होती है, मानसिक तनाव दूर होता है और परिवार में सुख-शांति का स्थायी वास होता है।

भाद्रपद पूर्णिमा की सरल पूजन विधि

प्रातः संकल्प एवं स्नान: सुबह पवित्र नदी या घर पर ही गंगाजल मिले जल से स्नान करें और पीले या श्वेत सात्विक वस्त्र धारण कर व्रत/पूजन का संकल्प लें।

भगवान सत्यनारायण पूजन: चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें। पंचामृत, मौसमी फल, पंजीरी का प्रसाद और तुलसी दल अर्पित करें। इसके पश्चात श्री सत्यनारायण कथा का श्रवण या पाठ करें।

संध्या समय चंद्र देव को अर्घ्य: शाम को चंद्रोदय के समय एक चांदी या तांबे के लोटे में कच्चा दूध, जल, अक्षत और सफेद पुष्प मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय 'ॐ सों सोमाय नमः' मंत्र का 11 बार जप करें।

पूर्णिमा श्राद्ध का महत्व: जिन पूर्वजों का देहावसान किसी भी माह की पूर्णिमा तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध और तर्पण आज के दिन करने का विधान है।

1. मुख्य द्वार पर हल्दी और गंगाजल का छिड़काव: पूर्णिमा के दिन प्रातः मुख्य द्वार की सफाई कर हल्दी मिले जल का छिड़काव करें। इससे घर के भीतर नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश रुकता है।

2. माँ लक्ष्मी को कौड़ी और खीर का भोग: सायंकाल लक्ष्मी जी के समक्ष गाय के घी का अखंड दीपक जलाएं और मखाने व दूध की खीर का भोग लगाएं। साथ ही 5 पीली कौड़ियां पूजन में रखकर अगले दिन अपनी तिजोरी में रख लें।

3. पीपल वृक्ष पर जल अर्पण: पूर्णिमा के दिन दोपहर से पूर्व पीपल के वृक्ष में जल, कच्चा दूध और बताशा अर्पित करना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन पीपल पर माँ लक्ष्मी का वास रहता है।

4. मानसिक शांति के लिए चंद्र दर्शन: जिन जातकों की कुंडली में चंद्रमा कमजोर या पीड़ित है, उन्हें आज रात्रि में कम से कम 15 से 20 मिनट चंद्रमा की रोशनी में बैठना चाहिए और चांदी के पात्र से जल पीना चाहिए।

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धार्मिक ज्ञान एवं पर्व

पितृ पक्ष (श्राद्ध): पितृ दोष के मुख्य लक्षण और घर पर तर्पण व श्राद्ध की सरल वैदिक विधि

सनातन धर्म में पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) का समय पूर्वजों और पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और तर्पण अर्पित करने का सबसे पवित्र काल माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, हमारे पूर्वज सूक्ष्म शरीर से इस अवधि में पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा दिए गए जल, अन्न और स्मरण को स्वीकार कर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यदि परिवार में पितृ दोष हो, तो पितृ पक्ष में किए गए सात्विक उपाय जीवन की तमाम रुकावटों को दूर कर वंश वृद्धि और सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

कुंडली और जीवन में पितृ दोष के प्रमुख लक्षण

संतान सुख में बाधा: योग्य संतान के विवाह में अप्रत्याशित विलंब होना या वंश वृद्धि में निरंतर रुकावटें आना।

पारिवारिक कलह और अशांति: परिवार में बिना किसी ठोस कारण के हर समय तनाव, अशांति या मनमुटाव बना रहना।

आर्थिक उन्नति का रुकना: दिन-रात परिश्रम करने के बावजूद बरकत न होना, जमा-पूंजी अचानक व्यर्थ कार्यों या बीमारियों में खर्च हो जाना।

अचानक दुर्घटनाएं या भय: मन में अकारण भय रहना या बार-बार पूर्वजों से जुड़े स्वप्न आना।

पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण की सरल विधि

1. नित्य जल तर्पण (अंगूठे के रास्ते जल अर्पण): प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके एक स्वच्छ पात्र में जल, कच्चा दूध, काले तिल और कुश रखें। दोनों हाथों की अंजलि से पितृतीर्थ (अंगूठे के भाग) से 3 बार पितरों के नाम से जल समर्पित करें।

2. पंचबली भोग: श्राद्ध की तिथि पर भोजन बनाकर सबसे पहले 5 हिस्सों में भोग निकाला जाता है—गाय (गोबली), कुत्ता (श्वानबली), कौवा (काकबली), देवगण (देवादिबली) और चींटियां (पिपीलिकादिबली)। इसके बाद ही घर के अन्य सदस्यों को भोजन करना चाहिए।

3. योग्य ब्राह्मण को भोजन एवं दान: पूर्वज की तिथि के दिन किसी सात्विक वैदिक ब्राह्मण को आदरपूर्वक घर बुलाकर भोजन कराएं अथवा मंदिर में सीधा (कच्चा अन्न, घी, दाल, आटा, वस्त्र और दक्षिणा) अर्पित करें।

4. पीपल वृक्ष की सेवा: पितृ पक्ष के दौरान दोपहर के समय पीपल के वृक्ष की जड़ में जल और कच्चा दूध अर्पित करना तथा सायंकाल सरसों के तेल का दीपक जलाना पितरों को परम तृप्ति प्रदान करता है।

पितृ पक्ष के दौरान क्या न करें?

इस अवधि में नए घर का गृह प्रवेश, विवाह, मुंडन जैसे शुभ व मांगलिक संस्कार नहीं किए जाते।

घर में पूर्ण सात्विकता का पालन करें—लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा और तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग रखें।

किसी भी बुजुर्ग, असहाय या द्वार पर आए भिक्षुक व पशु-पक्षी का अनादर न करें।

पितृ पक्ष में अपने पितरों की शांति एवं तर्पण हेतु विशेष संकल्प करवाएँ

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धार्मिक ज्ञान एवं पर्व

परिवर्तिनी एकादशी (जलझूलनी एकादशी): महत्व, व्रत नियम और भगवान विष्णु की पूजन विधि

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘परिवर्तिनी एकादशी’, ‘पद्मा एकादशी’ या ‘जलझूलनी एकादशी’ कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास के दौरान क्षीरसागर में योगनिद्रा में शयन कर रहे भगवान श्रीहरि विष्णु इस पावन तिथि पर करवट बदलते हैं। इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार और माता लक्ष्मी के पूजन से जीवन के समस्त पापों और आर्थिक संकटों का शमन होता है।

परिवर्तिनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व

पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं बताया था कि जो भक्त परिवर्तिनी एकादशी का व्रत और पूजन करता है, उसे वाजपेय यज्ञ के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है। यह एकादशी अनजाने में हुए पापों से मुक्ति दिलाने और घर में सुख-शांति व समृद्धि की वृद्धि करने वाली मानी गई है।

एकादशी पूजन की सरल विधि

प्रातः संकल्प एवं स्नान: सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर तीर्थ जल या गंगाजल मिले जल से स्नान करें और पीले वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लें।

भगवान विष्णु का अभिषेक: श्रीहरि के विग्रह या शालिग्राम जी को पंचामृत व शुद्ध जल से स्नान कराएं।

पीले पुष्प एवं तुलसी दल: भगवान को पीले चंदन का तिलक लगाएं, पीले फूल, फल और तुलसी दल अवश्य अर्पित करें (बिना तुलसी दल के श्रीहरि भोग स्वीकार नहीं करते)।

वामन अवतार कथा व मंत्र जप: इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ अथवा ‘ॐ विष्णवे नमः’ मंत्र की कम से कम 3 माला जपें तथा वामन अवतार की पावन कथा का श्रवण करें।

संध्या समय दीपदान: शाम के समय तुलसी जी के पास और घर के मुख्य द्वार पर गाय के घी का दीपक अवश्य प्रज्वलित करें।

एकादशी के दिन क्या न करें?

इस दिन घर में चावल (अन्न) का सेवन पूर्णतः वर्जित होता है।

एकादशी के पावन दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते (एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें)।

क्रोध, वाद-विवाद, असत्य भाषण और तामसिक भोजन से पूर्ण परहेज रखें।

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धार्मिक ज्ञान एवं पर्व

घर के मुख्य द्वार पर जरूर रखें ये 4 मांगलिक वस्तुएं: वास्तु दोष दूर कर लाती हैं सुख-समृद्धि

वास्तु शास्त्र और सनातन परंपरा में घर के मुख्य द्वार को केवल आने-जाने का रास्ता नहीं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा और माँ लक्ष्मी के आगमन का प्रमुख केंद्र माना गया है। यदि मुख्य द्वार पर कुछ खास मांगलिक और वैदिक प्रतीकों को सही विधि से स्थापित किया जाए, तो नकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश नहीं कर पाती और परिवार में सुख-शांति व बरकत बनी रहती है।

मुख्य द्वार के 4 अत्यंत शुभ मांगलिक प्रतीक

1. स्वास्तिक का पावन चिह्न: स्वास्तिक को भगवान गणेश और ऋद्धि-सिद्धि का साक्षात स्वरूप माना जाता है। मुख्य द्वार के दोनों ओर रोली या सिंदूर से 9 अंगुल लंबा और 9 अंगुल चौड़ा स्वास्तिक बनाने से वास्तु दोष समाप्त होते हैं और घर पर किसी की बुरी दृष्टि नहीं पड़ती।

2. आम या अशोक के पत्तों का तोरण: किसी भी शुभ कार्य या नित्य रूप से मुख्य द्वार पर आम या अशोक के ताजे पत्तों का बंधनवार (तोरण) बाँधना अत्यंत शुभ होता है। यह घर के भीतर आने वाली वायु को शुद्ध करता है और नकारात्मक तरंगों को सोख लेता है।

3. तांबे के लोटे या उरली में जल और ताजे पुष्प: मुख्य द्वार के पास एक स्वच्छ पात्र (तांबे का लोटा या पीतल की उरली) में स्वच्छ जल भरकर उसमें ताजे पीले या लाल फूल रखें। इससे घर में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति का मन शांत होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है।

4. माँ लक्ष्मी के चरण चिह्न (भीतर की ओर): मुख्य द्वार की चौखट पर माँ लक्ष्मी के चरण चिह्न ऐसे लगाएं कि उनकी दिशा घर के अंदर की तरफ आती हुई प्रतीत हो। यह धन के स्थायी वास और समृद्धि का प्रतीक है।

मुख्य द्वार पर क्या न रखें?

जूते-चप्पल का ढेर या टूटी-फूटी वस्तुएं कभी मुख्य दरवाजे के सामने न रखें।

मुख्य द्वार के ठीक सामने कूड़ेदान या झाड़ू खुला न छोड़ें।

मुख्य दरवाजे को खोलते या बंद करते समय कर्कश आवाज़ (चर्र-चर्र) नहीं आनी चाहिए, यदि आती हो तो तुरंत तेल डालें।

घर में सुख-समृद्धि हेतु वास्तु एवं शांति पूजन करवाएँ

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