मातृ नवमी 2026: माता, दादी और कुल की स्त्रियों के श्राद्ध का महत्व, पूजन विधि और अखंड सौभाग्य के उपाय

सनातन परंपरा में आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को ‘मातृ नवमी’ के नाम से जाना जाता है। इसे अविधवा […]

सनातन परंपरा में आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को ‘मातृ नवमी’ के नाम से जाना जाता है। इसे अविधवा नवमी भी कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार, यह तिथि परिवार की दिवंगत माताओं, दादियों, सास और कुल की समस्त पूजनीय स्त्रियों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान के लिए समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन किया गया श्राद्ध कुल की नारियों की आत्मा को परम तृप्ति प्रदान करता है और उनके आशीर्वाद से घर में अखंड सौभाग्य, वंश वृद्धि और संतान का कल्याण होता है।

मातृ नवमी पर किसका श्राद्ध किया जाता है?

  • दिवंगत माताओं और पूर्वज स्त्रियों का: जिन माताओं या कुल की स्त्रियों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, या जिनकी मृत्यु किसी भी महीने की नवमी तिथि को हुई हो, उन सभी का श्राद्ध मातृ नवमी को ही करने का विधान है।
  • सौभाग्यवती स्त्रियों के निमित्त: यदि किसी स्त्री का देहावसान उनके पति के रहते (सुहागिन रूप में) हुआ हो, तो उनके निमित्त इस दिन किया गया श्राद्ध अक्षय फलदायी होता है।

मातृ नवमी श्राद्ध की सरल वैदिक विधि

  • प्रातः संकल्प एवं सात्विक भोजन: सुबह स्नान कर स्वच्छ श्वेत या हल्के पीले वस्त्र धारण करें। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूर्वज माताओं का स्मरण कर हाथ में जल, अक्षत और तिल लेकर संकल्प लें।
  • खीर और पूड़ी का विशेष भोग: मातृ नवमी के दिन घर में खीर, पूड़ी और सात्विक मिष्ठान्न अवश्य तैयार करना चाहिए।
  • पंचबली भोग: भोजन तैयार होने के बाद सबसे पहले 5 पत्तों पर गाय, कुत्ते, कौवे, देवगण और चींटियों के लिए ग्रास निकालें।
  • ब्राह्मणी या सुहागिन स्त्री को भोजन एवं सुहाग सामग्री दान: इस दिन किसी योग्य ब्राह्मण परिवार की सात्विक ब्राह्मणी अथवा किसी सौभाग्यवती स्त्री को आदरपूर्वक भोजन कराएं। भोजनोपरांत उन्हें दक्षिणा के साथ लाल वस्त्र, रोली, चूड़ियां, बिंदी और फल-मिष्ठान्न भेंट कर चरण स्पर्श करें।

मातृ नवमी के दिन क्या लाभ मिलते हैं?

  • मातृ ऋण से मुक्ति: शास्त्रों में माता का ऋण सबसे बड़ा माना गया है। इस दिन श्रद्धापूर्वक स्मरण करने से मातृ दोष का निवारण होता है।
  • पारिवारिक क्लेश की समाप्ति: यदि परिवार में महिलाओं के बीच तनाव या अशांति रहती हो, तो पूर्वज माताओं के आशीर्वाद से घर में स्नेह और सौहार्द का वातावरण बनता है।
  • संतान सुख एवं विद्या वृद्धि: माताओं की आत्मा तृप्त होने पर संतान के स्वास्थ्य, विद्या और करियर की बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

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