वैदिक ज्योतिष में विवाह और वैवाहिक संबंधों के संदर्भ में मांगलिक दोष की चर्चा सर्वाधिक होती है। अक्सर लोग इसे लेकर अनजाने भय और भ्रम में रहते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि हर कुंडली में मांगलिक दोष अनिष्टकारी नहीं होता। यदि जन्म पत्रिका में मंगल ग्रह की स्थिति अनुकूल न हो, तो शास्त्रों में इसके शमन और शांति के स्पष्ट सात्विक नियम बताए गए हैं।
कुंडली में कब बनता है मांगलिक दोष?
शास्त्रों के अनुसार, लग्न कुंडली के प्रथम (1st), चतुर्थ (4th), सप्तम (7th), अष्टम (8th) अथवा द्वादश (12th) भाव में जब मंगल ग्रह विराजमान होता है, तब जातक को मांगलिक कहा जाता है:
- लग्न (प्रथम भाव) में मंगल: स्वभाव में उग्रता, जल्दबाजी और क्रोध बढ़ा सकता है।
- चतुर्थ भाव में मंगल: पारिवारिक शांति और गृहस्थ जीवन के सुख पर प्रभाव डालता है।
- सप्तम भाव में मंगल: दांपत्य सुख, जीवनसाथी के साथ सामंजस्य और साझेदारी को प्रभावित करता है।
- अष्टम भाव में मंगल: जीवन में आकस्मिक कष्ट और कलह की आशंका बढ़ाता है।
- द्वादश भाव में मंगल: अनिद्रा, अत्यधिक मानसिक तनाव और व्यर्थ के खर्चों का कारण बनता है।
मांगलिक दोष शांति के 4 अचूक उपाय
1. नित्य हनुमान जी की उपासना: प्रत्येक मंगलवार को सिंदूर और चमेली का तेल हनुमान जी को अर्पित करें एवं कम से कम 3 बार श्री हनुमान चालीसा का पाठ करें।
2. रक्तदान (सर्वश्रेष्ठ सात्विक उपाय): यदि स्वास्थ्य अनुमति दे, तो वर्ष में एक या दो बार स्वेच्छा से रक्तदान करना मंगल ग्रह की शांति का सर्वोत्तम उपाय माना गया है।
3. लाल मसूर व गुड़ का दान: मंगलवार के दिन किसी जरूरतमंद या सेवादार को सवा किलो लाल मसूर की दाल, गुड़ या तांबे का बर्तन दान करें।
4. विशेष जप एवं मंगल शांति विधान: गंभीर दोष की स्थिति में विद्वान ब्राह्मणों द्वारा ‘ॐ भौं भौमाय नमः’ मंत्र के 10,000 वैदिक जप अथवा उज्जैन अंगारेश्वर तीर्थ विधि से भात पूजा करवाना अत्यंत फलदायी होता है।
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