भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘परिवर्तिनी एकादशी’, ‘पद्मा एकादशी’ या ‘जलझूलनी एकादशी’ कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास के दौरान क्षीरसागर में योगनिद्रा में शयन कर रहे भगवान श्रीहरि विष्णु इस पावन तिथि पर करवट बदलते हैं। इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार और माता लक्ष्मी के पूजन से जीवन के समस्त पापों और आर्थिक संकटों का शमन होता है।
परिवर्तिनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व
पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं बताया था कि जो भक्त परिवर्तिनी एकादशी का व्रत और पूजन करता है, उसे वाजपेय यज्ञ के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है। यह एकादशी अनजाने में हुए पापों से मुक्ति दिलाने और घर में सुख-शांति व समृद्धि की वृद्धि करने वाली मानी गई है।
एकादशी पूजन की सरल विधि
प्रातः संकल्प एवं स्नान: सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर तीर्थ जल या गंगाजल मिले जल से स्नान करें और पीले वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लें।
भगवान विष्णु का अभिषेक: श्रीहरि के विग्रह या शालिग्राम जी को पंचामृत व शुद्ध जल से स्नान कराएं।
पीले पुष्प एवं तुलसी दल: भगवान को पीले चंदन का तिलक लगाएं, पीले फूल, फल और तुलसी दल अवश्य अर्पित करें (बिना तुलसी दल के श्रीहरि भोग स्वीकार नहीं करते)।
वामन अवतार कथा व मंत्र जप: इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ अथवा ‘ॐ विष्णवे नमः’ मंत्र की कम से कम 3 माला जपें तथा वामन अवतार की पावन कथा का श्रवण करें।
संध्या समय दीपदान: शाम के समय तुलसी जी के पास और घर के मुख्य द्वार पर गाय के घी का दीपक अवश्य प्रज्वलित करें।
एकादशी के दिन क्या न करें?
इस दिन घर में चावल (अन्न) का सेवन पूर्णतः वर्जित होता है।
एकादशी के पावन दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते (एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें)।
क्रोध, वाद-विवाद, असत्य भाषण और तामसिक भोजन से पूर्ण परहेज रखें।
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