पितृ पक्ष 2026: तिथि भूल गए हैं तो कब करें श्राद्ध? जानें पंचबली भोग का नियम और श्राद्ध का सही समय

सनातन धर्म में भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाला 16 दिनों का काल ‘पितृ […]

सनातन धर्म में भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाला 16 दिनों का काल ‘पितृ पक्ष’ कहलाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस काल में यमलोक से पितरों को अपने परिजनों से मिलने की अनुमति मिलती है। जो जातक इस अवधि में श्रद्धा और विधिपूर्वक अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण व पिंडदान करते हैं, उनके घर में सुख-समृद्धि, दीर्घायु और संतान सुख की वृद्धि होती है।

श्राद्ध का सर्वश्रेष्ठ समय: कुतुप और रौहिण मुहूर्त

शास्त्रों में श्राद्ध कर्म कभी भी प्रातःकाल या रात्रि में करने का निषेध है। पितरों के निमित्त कर्म हमेशा दोपहर के समय ही फलदायी होते हैं:

  • कुतुप मुहूर्त (पूर्वाह्न 11:48 AM से 12:36 PM): दिन का आठवां मुहूर्त कुतुप कहलाता है। यह श्राद्ध और तर्पण का सबसे उत्तम समय माना जाता है।
  • रौहिण मुहूर्त (दोपहर 12:36 PM से 01:24 PM): कुतुप के बाद का समय रौहिण मुहूर्त कहलाता है, जिसमें पिंडदान और ब्राह्मण भोज कराया जाता है।
  • अपराह्न काल: दोपहर 01:24 PM से 03:30 PM के मध्य सभी तर्पण और दान कार्य पूर्ण कर लेने चाहिए।

यदि पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो क्या करें?

कई बार लोगों को अपने माता-पिता या पूर्वजों की सटीक तिथि ज्ञात नहीं होती। इसके लिए शास्त्रों में विशेष व्यवस्था दी गई है:

  • माता का श्राद्ध: माता, दादी या किसी भी स्त्री पितर की तिथि ज्ञात न हो, तो उनका श्राद्ध नवमी तिथि (मातृ नवमी) को करना चाहिए।
  • अकाल मृत्यु: दुर्घटना, अस्त्र-शस्त्र या विष आदि से हुई मृत्यु का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है।
  • सर्वपितृ अमावस्या: जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि बिल्कुल ज्ञात न हो, या किसी कारणवश आप उनकी निश्चित तिथि पर श्राद्ध न कर पाए हों, तो उनका श्राद्ध आश्विन कृष्ण अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) को करने से पितर पूर्ण तृप्त होते हैं।

पंचबली भोग: श्राद्ध का सबसे अनिवार्य अंग

श्राद्ध के दिन ब्राह्मण भोजन से पूर्व भोजन में से 5 हिस्से पत्ते पर अलग निकालने का विधान है, जिसे ‘पंचबली’ कहा जाता है:

  1. गोबली (गाय के लिए): गाय में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है, यह पहला ग्रास पापों का नाश करता है।
  2. श्वानबली (कुत्ते के लिए): यमराज के दूत स्वरूप श्वान को भोजन अर्पित करने से पितृ मार्ग सुगम होता है।
  3. काकबली (कौवे के लिए): कौवे को यम और पितरों का संदेशवाहक माना जाता है।
  4. देवादिबली (देवताओं के लिए): समस्त वेदों और देवताओं की तृप्ति के लिए निकाला गया भाग।
  5. पिपीलिकादिबली (चींटियों के लिए): सूक्ष्म जीवों और कीट-पतंगों के उद्धार के लिए भोजन का अंतिम भाग भूमि पर रखा जाता है।

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